<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597</id><updated>2011-04-21T14:54:48.512-07:00</updated><title type='text'>बाकी सब ठीक है</title><subtitle type='html'>इस ब्लॉग पर हर सम्भव विषय की खिल्ली उडायी जायेगी. यदि आपकी आयु १८ से कम है या आप व्यँग्य को पचा नहीं पाते, तो आगे पढने का कष्ट ना करें. साधुवाद्.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>6</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-112948904303664509</id><published>2005-10-16T11:40:00.000-07:00</published><updated>2005-10-16T11:57:23.043-07:00</updated><title type='text'>जैनिटर-फायरफाईटर</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(0, 102, 0);"&gt;हमारे एक मित्र हैं, वाद-विवाद में मास्टर| पहले हम साथ ही काम करते थे| हमने नोटिस किया कि भाई जान सुबह दफ़्तर देर से आयेंगे, दिन में कम्प्युटर पर गेम्स खेलेंगे, शाम को भी जल्दी कट लेंगे| चाहते तो हम भी यही थे पर शायद उनके जितना जिगरा हमारे पास नहीं था, और उनका मैनेजर भी अमेरीकी ऑफिस में रहता था| एक दिन कॉफी के दौरान हमने पूछ ही लिया कि भय्ये ये मा़ज़रा क्या है? तो जनाब बोले - "&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 102, 0);"&gt;इस कम्पनी में दो तरह के लोग काम करते हैं - एक तो जैनिटर, जो रोज़ रोज़ का कचरा काम करने को रख छोडे हैं| और दूसरे फ़ायर-फ़ाईटर, जो कि उस्ताद लोग होते हैं पर उनकी ज़रूरत सिर्फ कुछ खास कामों और खास समय पर ही पडती है&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 102, 0);"&gt;"| अब उस वक्त तो यह सफ़ाईकर्मी-अग्निशामक थ्योरी सुन लिये, पर जब कुछ दिनों बाद उनका मैनेजर महीने भर के लिए यहाँ के ऑफिस आया तब जनाब के पैंतरे फिर बदल गये थे| अब तो सुबह-सुबह जल्दी आकर मैनेजर के साथ चाय पीते थे, दिन के हिसाब से १०-१५ ईमेल भी दुनिया के कोने-कोने में भेजते थे, शाम को डिनर-टाईम तक ऑफिस में पडे रहते थे| हम पैन्ट्री में इसी बदलाव पर चर्चा कर रहे थे, कि वे भी आ गये| जनाब जल्दी में थे, हम कुछ पूछते उस से पहले खुद ही बोले - "&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 102, 0);"&gt;आ गया साला अमरीकी यहाँ आग लगाने!&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 102, 0);"&gt;" &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112948904303664509?l=baakisabtheekhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/112948904303664509/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14854597&amp;postID=112948904303664509&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112948904303664509'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112948904303664509'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/2005/10/blog-post_17.html' title='जैनिटर-फायरफाईटर'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-112940749160054458</id><published>2005-10-15T12:47:00.000-07:00</published><updated>2005-10-15T16:12:55.403-07:00</updated><title type='text'>मैं हिन्दी में क्यों लिखता हूँ?</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;सच यही है कि मेरे हिन्दी ब्लॉग की शुरुआत के पीछे कौतूहल ही मुख्य भावना थी (&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;मेरे स्कूल में भी एक भावना थी, वो फिर कभी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;). हिन्दिनी के टूल ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मेरा हिन्दी ब्लॉग एक किस्म का geek's show off ही था. पर फिर मैंने महसूस किया कि हिन्दी को मैं किस कदर "मिस" कर रहा था. बचपन में हिन्दी मेरा प्रिय विषय हुआ करता था - शैक्षिक सत्र के शुरु में ही मैं हिन्दी की पूरी पाठ्य-पुस्तक चाट जाता था; जब हम अपने चचेरे भाई-बहनों से मिलने जाते थे, तब मैं उनकी पाठ्यपुस्तकें भी पढ डालता था. अब हिन्दी ब्लॉग जगत के चलते मुझे एक और मौका मिला था अपने पसंदीदा विषय से फिर जुडने का. मुझे यह भी एहसास हुआ कि चूँकि हिन्दी मेरी मातृभाषा है, मैं अपने विचार, अपना हास्य इसमें बेहतर व्यक्त कर सकता हूँ. ऐसा कतई नहीं है कि अंग्रेज़ी से मुझे कोई ग़ुरेज़ है, वास्तव में तो अंग़्रेज़ी के विस्तार और गहराई से मैं बेहद प्रभावित हूँ. पर हिन्दी के साथ जो बचपन से जुडाव है, जो रोज़मर्रा में प्रयोग करते हैं और जो रस हिन्दी में आता हैं, उसका नशा अलग ही है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;इतना सब पढने के बाद यही सोच रहे होंगे कि लम्बी-लम्बी फेंक रहा है, तो यह भी बता देता हूँ कि मैं हिन्दी में नियमित रूप से क्यों नहीं लिखता.  दरअसल, मेरे ३ ब्लॉग उपस्थित हैं. सबसे नियमित रूप से मेरा &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(153, 0, 0);" href="http://photoblog-vasingh.blogspot.com/"&gt;चित्र-चिठ्ठा&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt; छपता है, मेरा प्रयास रोज़ एक चित्र प्रकाशित करने का रहता है. फिर आता है मेरा &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(153, 0, 0);" href="http://vasingh.blogspot.com/"&gt;अंग़्रेज़ी चिठ्ठा&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;, वो करीब हफ्ते में २-३ दफ़ा अपडेट होता है. इस हिन्दी चिठ्ठे की आवृत्ति मासिक ही रह गयी है, परन्तु मैं इसको सुधारने की ओर प्रयत्नशील हूँ. मुख्य मुद्दा यही है कि हिन्दी ब्लॉग के लिए पहले हिन्दिनी टूल में लिखो, फिर copy-paste करो - थोडा भारी पड जाता है. आलस्य ही है जी, अब क्या कहें.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112940749160054458?l=baakisabtheekhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/112940749160054458/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14854597&amp;postID=112940749160054458&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112940749160054458'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112940749160054458'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/2005/10/blog-post_16.html' title='मैं हिन्दी में क्यों लिखता हूँ?'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-112811546096171514</id><published>2005-09-30T13:21:00.000-07:00</published><updated>2005-09-30T14:24:20.966-07:00</updated><title type='text'>बैंगलौर का ट्रेफ़िक</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);font-size:85%;" &gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;(&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-family: lucida grande; color: rgb(0, 0, 153);font-size:85%;" &gt;खेद है कि "ट्रेफ़िक" के लिए उपयुक्त हिंदी शब्द न ढूँढ पाया, आशा है शुद्ध भाषा-भाषी क्षमा करेंगे और ग़लती सुधारेंगे.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);font-size:85%;" &gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;फोर्ड चचा ने जब पहली मोटर-गाडी बनाई होगी तब यह ख्याल उन्हें छू कर भी न गया होगा की किस जिन्न को वो पूरी मानवता पर छोड दिये हैं. माना कि सहूलियत के लिहाज़ से अत्यन्त उपयोगी आविष्कार है, परन्तु साला ट्रेफ़िक में फंसे तो पूरे दिमाग़ का दही हो जाता है! खास करके जब कि ट्रेफ़िक बैंगलौर जैसे महानगर का हो तो मौला ही आपका मालिक है. अगर मुम्बई "सपनों का शहर" है, तो बैंगलौर सपना देखने वालों का शहर है - नतीज़तन आधे लोग आधी नींद में ही गाडी चला रहे होते हैं! गौरतलब बात ये है कि यहाँ कार वाले लोग कार मोटरसायकल की तरह चलाते हैं - दाँये-बाँये लहराते हुये, इधर-उधर घुसाते हुये. मोटरसायकल वाले हज़रात उसे सायकल की तर्ज़ पर फुटपाथ पर चढाते नहीं शरमाते. सायकल वाले बिल्कुल पदचालकों माफ़िक सब कानून, सब सिग्नल की धज्जियाँ उडाते घूमते हैं. बचे बेचारे पैदल-प्यादे, वो बेसहारे, मन में दुखडे लिए ट्रेफ़िक के बीच रेंगते नज़र आते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;अगर कोई समुदाय यहाँ की सडकों का बेताज़-बादशाह है, तो वे हैं ऑटोरिक्शा चालक. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;सडक की उल्टी तरफ अगर कोई गाडी दौडाने का माद्दा रखता है,तो वे हैं ऑटोरिक्शा चालक.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;खचाखच ठसी हुई सडक पर अगर किसी का ज़िगरा है U-टर्न मारने का, तो वे हैं ऑटोरिक्शा चालक.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;इनकी तारीफ में तो जितने क़सीदे पढे जायें कम हैं. अभी कल-परसों यहाँ ऑटोरिक्शा संघ ने हडताल कर दी. उस दिन तो मैंने ऊपरवाले से और कुछ भी माँगा होता, मिलता. दफ़्तर जाते समय मेरी पल्सर तो सडक पर यूँ चौकडियाँ भर रही थी, मानो मक्खन में छुरी! पर ये जन्नत अगले ही दिन मुझसे छिन गयी और कमबख्त पीले मूषकमुखी तिपहिये फिर से ट्रेफ़िक का बैण्ड बजाने लगे.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;फोर्ड चचा का अगला श्राप है - बस. बस - बडा ही छोटा शब्द है, शुरू हुआ कि बस खत्म. किन्तु बस शब्द ही छोटा है, बाकी सब बडा है. बडा वाहन, बडी क्षमता और बडी मुसीबत! यहाँ के बसचालकों ने तो मानो सम्पूर्ण बैंगलौर को भयमुक्त करने का बीडा उठाया है - जो माई का लाल इनके सामने सडक पार करने की चेष्टा भी करता है, मृत्यु से आँखें चार कर बैठता है. उसके बाद कैसा डर, किसका डर. जीवन के क्षणभँगुर होने का आभास करवाती हैं यहाँ की बसें. कुछ सौ मीटर तक खुली सडक क्या दिखी, बसचालक न पैदल जनता का सोचते हैं, न जर्जर बस की, बस हवा से बातें करने लगते हैं. कभी-कभी तो एक अजूबा ही लगता है कि ललिता पवार की उम्र की बसें, प्रियँका चोपडा सरीखी अठखेलियाँ कर रही हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt;अन्त में यहाँ का प्रशासन - एक वो धर्मराज युधिष्ठिर था जिसने द्रोपदी की साडी उतरवा दी थी, एक यहाँ &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-family: lucida grande; color: rgb(0, 0, 153);font-size:85%;" &gt;धरम-राज&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);font-size:85%;" &gt;&lt;span style="font-family: lucida grande;"&gt; है जिसमें यहाँ की सडकों को उधेडा जा रहा है. दिल्ली की तर्ज़ पर हवाई-पुल (flyovers) बनाने का निश्चित तो कर दिया है, पर श्रद्धा का टोकरा खाली ही है. परिणाम यह कि बहुत सी सडकें खोदी तो गयीं, पर उसके बाद प्रशासन उसे ऐसे भूल गया जैसे सौरव गाँगुली बल्ला पकडना भूल गया है. पहले भी सडकें हेमामालिनी के कपोलों सी तो नहीं थीं, पर खुदाई के बाद तो मानो कोई हिमालयन रैली का ट्रेक तैयार हो गया हो. कभी-कभी के लिये ऐसे जोखिम के काम सुहाते हैं, रोज़-रोज़ यह झेलना तो अत्यन्त दुष्कर हैं. गाडियोँ की वाट लगती है सो अलग!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112811546096171514?l=baakisabtheekhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/112811546096171514/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14854597&amp;postID=112811546096171514&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112811546096171514'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112811546096171514'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/2005/09/blog-post_30.html' title='बैंगलौर का ट्रेफ़िक'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-112689740454794640</id><published>2005-09-16T11:40:00.000-07:00</published><updated>2005-09-16T12:03:24.553-07:00</updated><title type='text'>चुगलियाँ</title><content type='html'>(&lt;em&gt;वी.वी.एस.लक्ष्मण की तर्ज़ पर वापसी कर रहा हूँ, उम्मीद है इस दफ़ा नियमित रहुँगा.&lt;/em&gt;)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते दिनों भारतीय क्रिकेट टीम एक और फाइनल में पिट गयी. नया ये नहीं है, नया ये है कि अब ICC ने शँका जताई है कि वह मैच फिक्स्ड हो सकता है. BCCI ने साफ नकार दिया है, भाई कौन पैसे देगा इनको हारने के लिये? ये काम तो ये कब से बिना पैसे लिये ही कर रहे हैं. आज-कल खेल चैनल्स के बीच बडी मार-काट मची है. अब नया ये चालू हुआ है कि जब भी कभी भारत का क्रिकेट मैच होता है, विरोधी चैनल छाँट-छाँट के पुराने मैच दिखाते हैं जहाँ भारत जीता हो. अब एक तरफ आपको पता है कि भारत जीतेगा, और दूसरी तरफ पक्का हारेगा तो साफ़ है कि आप कौनसा मैच देखेंगे.  श्रीलंका के मुरलीधरन भी सट्टेबाज़ी वाले केस में शक़ के दायरे में हैं. कहते हैं आदित्य पाँचोली उनको दीपा बार ले गये थे, बार-बाला तर्रन्नुम खान से मिलवाने. अपने पाँचोली साब खुश थे कि इसी बहाने सही, इतने समय बाद किसी स्क्रीन पर तो दिखेंगे. सज-धज के TV स्टूडियो पहुँचे तो पता चला कि TV टीम उन्ही के घर गयी है. भागे-भागे घर पहुँचे तब तक मुरली का बयान आ चुका था, TV पर पाँचोली साब को भगोडा घोषित किया जा चुका था और पाँचोली साब को फिर से कोई कुत्ता भी नहीं पूछ रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा में आजकाल बेहद दिलचस्प कबड्डी चल रही है. खुराना साब ने लंगडी मारी आडवाणी को, खुद धूल चाट रहे हैं. २४ घण्टे के अन्दर-अन्दर लाइन पर आ गये और आडवाणी को अपनी सात पुश्तों का गुरु मान लिया. इसको कहते हैं थूक के चाटना. अब तो कसम से देश भर की गृहणियाँ भी सूरज ढले सास-बहू बकर की बजाये न्यूज़ पर उमा-खुराना ड्रामा देखना पसंद करती हैं. इसिलिये एकता कपूर ने नया धारावाहिक डाला है - &lt;strong&gt;कहानी ज़िन्ना की कसौटी की&lt;/strong&gt;.  मतलब जिन्ना साहब भी यही मलाल ले के अल्लाह को प्यारे हुये थे कि साला कोई पूछता ही नहीं. अब जाके उनकी रूह को भी सुकून मिला होगा की सरहद पार ही सही, लोग याद तो करते हैं. तब भी मेरे नाम पर बँटवारे हुये, अब भी मुल्क नहीं तो एक पार्टी तो बँटेगी ही बँटेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेल की कीमत और बढ गयी. अब सुना है कि तेन्डुलकर ने अपनी कर-मुक्त फेरारी वास्ते सरकार से कर-मुक्त पेट्रोल की माँग की है. हम तो अब बस पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल सूँघ कर ही जी बहलाते हैं, पर हमारे एक मित्र हैं, सुनते हैं उन्होंने अपनी शादी में कार लेने से मना कर दिया. बदले में पेट्रोल माँग लिया, भाई इन्वेस्टमेंट वास्ते. उनके ससुराल वाले बेचारे सडक पर आ गये हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112689740454794640?l=baakisabtheekhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/112689740454794640/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14854597&amp;postID=112689740454794640&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112689740454794640'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112689740454794640'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/2005/09/blog-post.html' title='चुगलियाँ'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-112330751211338484</id><published>2005-08-05T22:50:00.000-07:00</published><updated>2005-08-07T14:54:24.226-07:00</updated><title type='text'>सॉफ्टवेयर महिमा</title><content type='html'>हाल-फिलहाल में ही एक मित्र ने पूछा कि "अभी तक सॉफ्टवेयर से मन नहीं भरा?". उस मूढ की मूर्खता पर मुझे बहुत ही हंसी आई और मन में यह सूझा - "मूर्ख हैं वो जो सॉफ्टवेयर को बदनाम करते हैं, यह तो वह नौकरी है जहाँ सब विश्राम करते हैं" (&lt;em&gt;विद्वजन जान ही गये होंगे कि यह मुहावरा कहाँ से उठाया गया है&lt;/em&gt;). शायद यही एक ऐसी नौकरी होगी जहाँ दिन भर कम्प्युटर (संगणक) पर गेम्स खेलने के इतने पैसे मिलते हैं कि आप घर पर खेलने के लिये भी गेम्स खरीद सकते हैं. मतलब पूरी ज़िन्दगी सेट! दिन में दफ्तर में खेलो, रात में घर में खेलो -- किंचित यही कारण है कि भारतीय जन इस क्षेत्र में बहुत नाम कमा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह सब सुन कर आप इस मुग़ालते में हों कि इस नौकरी में कुछ करने को नहीं, तो इस शंका का भी निवारण किये देते हैं. अब काम का तो यह है कि लगभग सभी सॉफ्टवेयर कम्पनियों में हर हफ्ते conference call करवाने का प्रचलन है. इसमें होता यह है कि सभी ये शेखी बघारते हैं कि गत सप्ताह में उन्होंने क्या तीर मारे और आगामी सप्ताह के लिए क्या उम्मीदें लगाये बैठे हैं. तो हफ्ते भर का काम इस call के एक दिन पहले निपटाया जाता है. भई, जब तक काम में रोमांच ना हो, कैसा आनन्द? असल खतरों के खिलाडी तो वे होते हैं जो कि call में bluff मारते हैं. तात्पर्य यह कि काम किया नहीं पर call में घोषित कर दिया. मतलब अगले हफ्ते दूना रोमांच!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सॉफ्टवेयर बनाने के लिए एक पूरा कार्यक्रम निर्धारित होता है. शुरु के कुछ महिने तो मैनेजर तथा अन्य ऊपरी लोग दुनिया भर के कागज़ काले करते हैं. पहले एक functional specification तैयार होता है, जिसे हर हफ्ते निरंतर बदलते रहते हैं. इसके बाद नम्बर आता है design document का, बोले तो कि आखिर क्या करना है और कैसे करना है. यह एक दफ़ा निर्धारित हुआ तो अब सब बैठ के इनकी चीर-फाड करते हैं. फिर से कागज़ काले किये जाते हैं, फोन घुमाये जाते हैं, ई-मेल टपकायीं जाती हैं. इसी सब में प्रकाशन-तिथि (release date) नज़दीक आ जाती है. यह शब्द किसी भी सॉफ्टवेयर वाले की नानी के इन्तक़ाल के लिए क़ाफी है! जब कोड लिखने के लिए गिने-चुने दिन ही रह जाते है, तब कहीं जाके प्रोगामर लोग की पूछ होती है. इस अवस्था में अब अपनी सहूलियत से पूरी कार्य-प्रणाली (functionality) उलटी-पलटी जाती है. बहुत से नौजवान कोडर लोगों को दफ़्तर में रातें काली करनी पडती हैं (&lt;em&gt;जिसका बदला वो कम्पनी के पैसों पर पिज़्ज़ा खा कर निकालते हैं&lt;/em&gt;), बहुतों को तो कई-कई दिनों तक बिना ऑफिस में गेम्स खेले रहना पडता है! अन्त में जब किसी को भी और काम करने की श्रद्धा नहीं रहती, तब जो भी चूँ-चूँ का मुरब्बा तैयार होता है, उसी को बाज़ार में उतारा जाता है. सुनने में काफ़ी झन्झट का काम लगता है, पर ऐसा साल में बस १-२ दफा ही होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर जो सबसे बढिया बात है वो है आम जनता में सॉफ्टवेयर वालों के लिए इज़्ज़त. कभी रिश्तेदारों से मिलो तो यही कहते हैं कि - "&lt;em&gt;बहुत काम होता होगा ना, काम से फुरसत कहाँ मिलती होगी?&lt;/em&gt;". और जब तन्ख्वाह कि सुनते हैं तो उनकी भी बाँछें खिल जाती हैं. आपकी छवि एक सुपर-स्टार से कम नहीं होती. हाँ कभी कोई अगर पूछ बैठे कि आखिर काम क्या करते हो तो समझाने में मुश्क़िल हो जाती है, पर फिर &lt;em&gt;कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता&lt;/em&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112330751211338484?l=baakisabtheekhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/112330751211338484/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14854597&amp;postID=112330751211338484&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112330751211338484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112330751211338484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/2005/08/blog-post.html' title='सॉफ्टवेयर महिमा'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-112257809003089090</id><published>2005-07-28T10:39:00.000-07:00</published><updated>2005-07-28T12:14:50.040-07:00</updated><title type='text'>आज के मुख्य समाचार</title><content type='html'>आडवानी साहब ने आज फिर कुछ कहा -- &lt;em&gt;जब तक राम मन्दिर नहीं बन जाता, जनता शान्ति से नहीं बैठेगी&lt;/em&gt;. लेकिन, किन्तु, परन्तु आडवानी जी, इसी बीच में तो आपकी सरकार भी थी, आप भी तो उप-प्रधानमन्त्री थे. तब आपका मन क्योंकर न हुआ मन्दिर बनाने का? ईश्वर ही जाने संयोग है या क्या है, पर आज ही आडवानी जी पर अयोध्या काँड वाले मुक़द्दमे में अदालत में आरोप लगाये गये हैं. किन्चित इसी कारण ये सोच रहे हैं कि इससे पहले कि हालात धोबी के कुत्ते सी हो जाये, पाला-बदली का खेल बन्द करके पुराने हिट फोर्मुला ही बरता जाये. पर अब जनता भी इस बयानबाज़ी को भाव नहीं देती. अब काठ की हान्डी कितनी बार चुल्हा चढाइयेगा महोदय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों मुम्बई में वर्षा ने भीषण त्राहि मचाई. कई इलाकों में घण्टों बिजली गुल रही, फोन आदि सुविधायें ठप्प रहीं, यहाँ तक की लोगों को सडक पर रातें बितानी पडी. पर ये बरसात कुछ लोगों के लिये शुभ भी साबित हुई. अपने सलमान भाई ने चैन की साँस ली कि अब तो फोन भी नहीं चल रहा. बेचारे जब भी फोन उठाते हैं, कुछ न कुछ कबाडा कर लेते हैं. वैसे Airtel ने मुम्बई में जनता की परेशानियाँ देखते हुये लोकल काल्स मुफ्त कर दिये हैं. अपने श्री समाजसेवी विवेक ओबेरोय ने फिर से अपनी दरियादिली का परिचय देते हुये एक नया Airtel फोन सलमान को और उस फोन का नम्बर RAW को भेज दिया हैं. भाई, उन्हे भी तो पता चले कि सल्लू भाई आजकल किस को गलिया रहे हैं! वहीं उनके अनुज, सौहेल मियाँ अब कहते फिर रहे हैं कि बारिश के ही कारण उनकी नयी फिल्म "मैंने प्यार क्यों किया" मुम्बई में चल नहीं रही. ये हुआ न chance पे dance. फिल्म तो आपने सुभान-अल्लाह ऐसी बनाई है कि पैसे दे कर दिखाने पर भी कोई ना देखे, फिर फ्लॉप होने का ठीकरा कभी शिवसेना तो कभी बारिश के सर फोड रहें हैं. मतलब, हद्द होती है बेशर्मी की भी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरियाणा के गुडगाँव में पुलिस ने मज़दूरो की उग्र भीड को कुछ ऐसा काबू में किया की बहुतों की अभी तक कुछ खबर नहीं हैं. बरसों तेल पिलायी हुई लाठियाँ ऐसी भाँजी की सैकडों को अस्पताल जाना पडा. कम्पनी से त्रासद श्रमिक पुलिस के ऐसे हत्थे चढे कि अब शायद ही कहीं काम करने लायक बचें. ऐसा नहीं कि ये कोई अपने आप में नायाब घटना हो, पर इस दफा पुलिस की ये कवायद न्यूज़ चैन्लस के कैमरों में आ गई. देश भर में मानो कोहराम मच गया! खबर वालों को भी मल्लिका के MMS और गान्गुली की रोक के अलाव कुछ दिखाने को मिल गया. सरकार शायद इसे मामूली झडप बता कर अपना पल्ला झाड लेती पर वामपन्थियों ने इस पर भी सरकार की उठक-बैठक करवा दी. &lt;em&gt;अब रे ताऊ, मन्ने तो यो बेरा ना पाट रिया की ये ससुरे वामपन्थी सरकार के सागे सैं के खिलाफ़ सैं&lt;/em&gt;! भाजपा, जो कि विपक्ष का सबसे बडा दल है, उसके मुँह पर तो अपनों के कारनामों के चलते ही ताला लगा हैं. बेचारे सदन से walkout के अलावा कुछ करते नहीं, और एक ये साथी हैं कि हर बात में नुख्स निकालते हैं. सरकार का आधा समय तो इनकी मान-मनुहार में ही निकल जाता है. पिछले दिनों ए.बी.प्रधान सोनिया जी से ये शिकायत करने पहुँच गये कि उनके खानसामे की कॉलॉनी में बिजली नहीं है. अब कल चले आयेंगें कि दूधवाले के यहाँ पानी नहीं हैं, परसों कहेंगे कि मेरी चाय में चीनी नहीं है. सोनिया जी ने भी राजनीति में कूदने के पहले यह नहीं सोचा होगा कि ऐसा भी दिन आयेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल MMS की बहुत चर्चा है. शायद इसे बनाने वाले लोगों ने भी इसका ऐसा उपयोग न सोचा होगा जैसा हम भारतीयों ने कर दिखाया हैं. मार्केट में नवीनतम MMS सानिया मिर्ज़ा का कहते हैं. भाई, आजकल सितारों के लिये तो यह एक स्टेटस सिम्बल हो चला है. जो जितना बडा सितारा, उसका MMS सबसे पहले. कुछ तो ऐसी गयी-गुज़री हीरोइनों ने भी बॉडी डबल्स पर इल्ज़ाम डाले हैं, जिन्हें खुद को कोई नहीं पूछता. सुनने में यह भी आया है कि डी.पी.एस. स्कूल के उन होनहार विद्यार्थियों को मोबाइल कम्पनियों ने रॉयल्टी के तौर पर मोटी रकम देने की सोची है. आखिर वो ना होते तो इन कम्पनियों को MMS के ज़रिये इतना मुनाफा कैसे होता भला? अब तो इतने सारे MMS चक्कर लगा रहे हैं कि सुनने में आया हैं कि एक नया टी.वी. चैनल शुरू होने वाला है जिस पर पूरे समय बस यही MMS दिखाये जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस अभी के लिये इतना ही. बाकी सब ठीक है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112257809003089090?l=baakisabtheekhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/feeds/112257809003089090/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14854597&amp;postID=112257809003089090&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112257809003089090'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14854597/posts/default/112257809003089090'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baakisabtheekhai.blogspot.com/2005/07/blog-post.html' title='आज के मुख्य समाचार'/><author><name>Varun Singh</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://img239.imageshack.us/img239/4871/chennaiyercaud22715yu.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
