Sunday, October 16, 2005
जैनिटर-फायरफाईटर
हमारे एक मित्र हैं, वाद-विवाद में मास्टर| पहले हम साथ ही काम करते थे| हमने नोटिस किया कि भाई जान सुबह दफ़्तर देर से आयेंगे, दिन में कम्प्युटर पर गेम्स खेलेंगे, शाम को भी जल्दी कट लेंगे| चाहते तो हम भी यही थे पर शायद उनके जितना जिगरा हमारे पास नहीं था, और उनका मैनेजर भी अमेरीकी ऑफिस में रहता था| एक दिन कॉफी के दौरान हमने पूछ ही लिया कि भय्ये ये मा़ज़रा क्या है? तो जनाब बोले - "इस कम्पनी में दो तरह के लोग काम करते हैं - एक तो जैनिटर, जो रोज़ रोज़ का कचरा काम करने को रख छोडे हैं| और दूसरे फ़ायर-फ़ाईटर, जो कि उस्ताद लोग होते हैं पर उनकी ज़रूरत सिर्फ कुछ खास कामों और खास समय पर ही पडती है"| अब उस वक्त तो यह सफ़ाईकर्मी-अग्निशामक थ्योरी सुन लिये, पर जब कुछ दिनों बाद उनका मैनेजर महीने भर के लिए यहाँ के ऑफिस आया तब जनाब के पैंतरे फिर बदल गये थे| अब तो सुबह-सुबह जल्दी आकर मैनेजर के साथ चाय पीते थे, दिन के हिसाब से १०-१५ ईमेल भी दुनिया के कोने-कोने में भेजते थे, शाम को डिनर-टाईम तक ऑफिस में पडे रहते थे| हम पैन्ट्री में इसी बदलाव पर चर्चा कर रहे थे, कि वे भी आ गये| जनाब जल्दी में थे, हम कुछ पूछते उस से पहले खुद ही बोले - "आ गया साला अमरीकी यहाँ आग लगाने!"
Comments:
<< Home
वरूण, तुम्हारे जिगरे वाले विवादी मित्र जानते हैं कि काम बड़ी अमूल्य वस्तु है। अमूल्य वस्तु लुटाई नहीं जाती। इस लिये वह काम करके उस को गंवाते नहीं हैं।
बस ऐसे १००० महानुभावों को अमेरिका में काम करने के लिए भेज दो, अमेरीका का बण्टाढार!
वैसे, पढ़कर मज़ा आगया।
Post a Comment
बस ऐसे १००० महानुभावों को अमेरिका में काम करने के लिए भेज दो, अमेरीका का बण्टाढार!
वैसे, पढ़कर मज़ा आगया।
<< Home


